उज्जैन | मध्य प्रदेश के उज्जैन में अप्रैल 2026 में आयोजित ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ कॉन्फ्रेंस के लिए वाहनों के किराये पर हुए खर्च को लेकर सवाल उठे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, परिवहन से जुड़े बिलों में दर्ज कुछ वाहन नंबर और उनके प्रकार कथित तौर पर क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते। इस आयोजन के लिए वाहन किराये के मद में 57 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है।
रिपोर्टों में एक ई-रिक्शा के पंजीकरण नंबर पर बड़ी कार का बिल बनाए जाने और एक मोपेड के नंबर को ट्रैवलर वाहन के बिल में दर्ज किए जाने जैसे मामले बताए गए हैं। यदि इन विसंगतियों की पुष्टि होती है, तो भुगतान से पहले बिलों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे अंतिम रूप से साबित हुआ घोटाला कहना उचित नहीं होगा।
क्या है पूरा मामला?
‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ नाम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस अप्रैल 2026 में उज्जैन में हुई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कार्यक्रम के लिए वाहनों की व्यवस्था की गई थी और उनके किराये के भुगतान से जुड़े दस्तावेजों में कथित विसंगतियां सामने आईं।
बताया गया है कि बिलों में दर्ज वाहन पंजीकरण नंबरों का RTO रिकॉर्ड से मिलान करने पर कुछ मामलों में वाहन की श्रेणी अलग मिली। इस वजह से यह सवाल उठा कि बिल में जिस वाहन की सेवा दिखाई गई, क्या वास्तव में वही वाहन कार्यक्रम में इस्तेमाल हुआ था।
ई-रिक्शा और मोपेड के नंबरों पर उठे सवाल
प्रकाशित रिपोर्टों में एक बिल का उल्लेख है, जिसमें वाहन नंबर MP13-ZP4512 को इनोवा कार के तौर पर दर्शाए जाने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस नंबर का पंजीकरण रिकॉर्ड ई-रिक्शा से जुड़ा है।
एक अन्य मामले में UP65-ED1523 नंबर को ट्रैवलर वाहन के बिल में दर्ज किए जाने की बात सामने आई है, जबकि रिपोर्ट के अनुसार संबंधित नंबर मोपेड के नाम पर पंजीकृत है।
इन मामलों में मुख्य सवाल यह है कि वाहन का प्रकार, पंजीकरण विवरण और उपलब्ध कराई गई सेवा का सत्यापन किस तरह किया गया। मूल बिलों, वाहन पंजीकरण प्रमाणपत्रों और ड्यूटी रिकॉर्ड की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अंतर किस कारण से आया।
एक दिन में 38 घंटे की ड्यूटी दर्ज होने का दावा
वाहन बिलों से जुड़ी रिपोर्टों में एक ही वाहन के लिए एक दिन में कुल 38 घंटे की ड्यूटी दर्ज होने का भी उल्लेख है। अलग-अलग बिलों में 10, 13 और 15 घंटे की ड्यूटी का हिसाब दिए जाने की बात कही गई है।
एक कैलेंडर दिन में 24 घंटे होते हैं, इसलिए इन प्रविष्टियों का कुल योग जांच की जरूरत को रेखांकित करता है। हालांकि, यह पता लगाने के लिए मूल बिलों और ड्यूटी समय का मिलान आवश्यक है कि यह दोहरी बिलिंग, रिकॉर्ड में गलती या किसी अन्य वजह से हुआ।
मीटर रीडिंग में बड़े अंतर का भी उल्लेख
एक अन्य रिपोर्ट में वाहन की ड्यूटी स्लिप पर दर्ज किलोमीटर रीडिंग में असामान्य अंतर होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 3 और 4 अप्रैल की प्रविष्टियों के मुकाबले 5 अप्रैल को दर्ज रीडिंग में 22,708 किलोमीटर की बढ़ोतरी दिखाई गई।
इस तरह के अंतर की पुष्टि के लिए मूल ड्यूटी स्लिप, वाहन के मीटर का रिकॉर्ड और यात्रा से जुड़े अन्य दस्तावेज देखना जरूरी है। केवल प्रकाशित विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अंतर जानबूझकर दर्ज किया गया था या किसी रिकॉर्डिंग संबंधी गलती से हुआ।
भुगतान और बिलों के सत्यापन पर उठे सवाल
वाहन किराये के लिए 57 लाख रुपये से अधिक के भुगतान की रिपोर्टों के बाद यह मामला खर्च के दस्तावेजों की जांच से जुड़ गया है। अब महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग और आयोजन से जुड़ी संस्थाएं बिलों, वाहन नंबरों, ड्यूटी की अवधि तथा भुगतान स्वीकृति के रिकॉर्ड का मिलान करें।
मीडिया रिपोर्टों में ट्रैवल एजेंसी की ओर से बिल सही होने का दावा और संबंधित संस्थाओं की ओर से मामले की जानकारी लेने या गड़बड़ी मिलने पर जांच कराने की बात भी सामने आई है। इन प्रतिक्रियाओं और दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि प्रकाशन से पहले की जानी चाहिए।
फिलहाल, सामने आई जानकारी कथित विसंगतियों और जांच से जुड़े सवालों की ओर इशारा करती है। किसी व्यक्ति, एजेंसी या अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने के लिए आधिकारिक जांच और मूल दस्तावेजों के निष्कर्ष जरूरी होंगे।