प्रकाशित: 7 जुलाई 2025 | The Mediawala Express डेस्क
रांची — झारखंड में वन क्षेत्र और ग्रामीण इलाकों के बीच मानव और हाथियों के बीच का संघर्ष अब सिर्फ एक वन्यजीव मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह राज्य सरकार के लिए बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन चुका है। 2008 से 2024 तक के आंकड़े बताते हैं कि इन 16 वर्षों में 1251 लोग हाथियों के हमलों में मारे गए, जबकि 202 हाथियों की भी मौत हुई।
वनों के लगातार कटाव और हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर पर तेजी से हो रहा अतिक्रमण इस टकराव की मुख्य वजह बना है। हाथी अब भोजन और रास्ते की तलाश में गांवों की ओर बढ़ने लगे हैं।
पांच साल में तेजी से बढ़ी घटनाएं
- 2023-24: 87 लोगों की मौत, 17 हाथियों की मौत
- 2022-23: 96 मौतें, 17 हाथियों की मौत
- 2021-22: 133 मौतें, 8 हाथियों की जान गई
बोकारो जिले में 2022-23 में ही 13 मौतें, 900 से अधिक संपत्ति और फसल नुकसान के मामले दर्ज हुए। राज्य सरकार ने इन घटनाओं पर ₹10.13 करोड़ का मुआवजा जारी किया।
किसान सबसे ज्यादा प्रभावित
पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया ब्लॉक में किए गए 2024 के एक सर्वेक्षण में सामने आया कि 94% किसान हाथी संघर्ष से प्रभावित हैं, और फसल नुकसान 25% से 75% तक रिकॉर्ड किया गया।
विशेषज्ञों की राय: संतुलन टूटा है
पर्यावरणविद डॉ. नितीश प्रियदर्शी मानते हैं कि हाथियों के पारंपरिक रास्तों पर इंसानी गतिविधियों के फैलाव ने उन्हें बस्तियों की ओर आने को मजबूर किया है। उनका कहना है कि “अगर हाथियों के कॉरिडोर को जल्द बहाल नहीं किया गया, तो यह संघर्ष और घातक हो जाएगा।”
सरकार की रणनीति और चुनौतियां
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) पारितोष उपाध्याय के मुताबिक, झारखंड में 17 से अधिक हाथी कॉरिडोर अधिसूचित किए जा चुके हैं। हाथियों की आवाजाही पर निगरानी के लिए रेडियो कॉलर तकनीक लाने की योजना है, जिससे झुंडों को ट्रैक कर ग्रामीणों को समय रहते चेतावनी दी जा सके।
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