रांची:
झारखंड को वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद से अब तक 16,408.78 करोड़ रुपये का भारी राजस्व घाटा हो चुका है। वाणिज्य कर विभाग द्वारा तैयार की गई एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में यह घाटा और भी गंभीर होता जाएगा। मार्च 2030 तक राज्य को कुल 61,676.66 करोड़ रुपये के नुकसान की संभावना जताई गई है।
➤ रिपोर्ट में 13 वर्षों का आकलन
वाणिज्य कर विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें वर्ष 2017-18 से लेकर 2029-30 तक के कुल 13 वर्षों के राजस्व घाटे का विश्लेषण किया गया है।
- 2025-26 में अनुमानित घाटा: ₹8136.05 करोड़
- 2029-30 तक यह बढ़कर हो सकता है: ₹17,257.60 करोड़
- कुल अनुमानित नुकसान (2017 से 2030 तक): ₹61,677 करोड़
➤ जीएसटी लागू होने के पहले साल हुआ था मामूली लाभ
जीएसटी लागू होने के शुरुआती नौ महीनों (जुलाई 2017 से मार्च 2018) के दौरान झारखंड को ₹297.16 करोड़ का राजस्व लाभ हुआ था। लेकिन उसके बाद से प्रत्येक वित्तीय वर्ष में घाटा ही होता रहा है, जो लगातार बढ़ता गया।
जानिए क्यों हो रहा है झारखंड को इतना बड़ा नुकसान
उत्पादन के बदले खपत आधारित टैक्स सिस्टम
जीएसटी प्रणाली खपत पर आधारित है, जबकि पहले की व्यवस्था में उत्पादन करने वाले राज्य को टैक्स लाभ मिलता था।
- जीएसटी से पहले कंपनियों द्वारा झारखंड से बाहर भेजे गए माल पर 2% सेंट्रल सेल्स टैक्स (CST) लगता था, जो सीधे राज्य सरकार को प्राप्त होता था।
- अब वही माल यदि बाहर खपत हो रहा है, तो उसका टैक्स उस राज्य को जाता है जहां वह उपभोग हो रहा है — झारखंड को नहीं।
प्रति व्यक्ति आय में पिछड़ापन
झारखंड की प्रति व्यक्ति आय देश में 26वें स्थान पर है। इसका मतलब है कि राज्य में खपत भी अपेक्षाकृत कम है, और जीएसटी आधारित प्रणाली में राजस्व का बड़ा हिस्सा उन राज्यों को मिलता है जहां उपभोग ज़्यादा होता है।
उद्योग का वितरण असंतुलित
बिहार में प्रति व्यक्ति आय भले ही झारखंड से भी कम हो, लेकिन वहां बड़े उद्योगों की कमी के कारण राज्य को पहले CST जैसा टैक्स मिलता ही नहीं था। वहीं झारखंड जैसे राज्य, जहां उत्पादन होता है लेकिन खपत बाहर होती है, उन्हें अब जीएसटी में भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
क्या उपाय किए जा सकते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार झारखंड को जीएसटी परिषद में अपने पक्ष को मजबूती से रखना होगा। साथ ही राज्य को अपनी आंतरिक खपत बढ़ाने, औद्योगिक नीति में बदलाव लाने और सेवाक्षेत्र का विस्तार करने की जरूरत है ताकि राज्य में खपत आधारित टैक्स संग्रह बढ़ सके।
निष्कर्ष
झारखंड जैसे खनिज-समृद्ध राज्य, जहां उद्योग हैं लेकिन स्थानीय खपत सीमित है, जीएसटी की मौजूदा संरचना में पिछड़ रहे हैं। जब तक टैक्स वितरण प्रणाली में संतुलन नहीं लाया जाता, तब तक इस घाटे की भरपाई मुश्किल है। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नीति-निर्माण से जुड़ा गंभीर विषय है जिस पर अब बहस और ठोस कदम दोनों की जरूरत है।