30 साल की उम्र के बाद महिलाओं के लिए अपनी सेहत की नियमित निगरानी करना महत्वपूर्ण हो जाता है। इस उम्र में काम, परिवार और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच कई महिलाएं अपनी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज कर देती हैं। कई बीमारियां शुरुआती दौर में स्पष्ट लक्षण नहीं दिखातीं, ऐसे में सही समय पर जांच कराने से जोखिम का पता लगाने और जरूरत पड़ने पर इलाज शुरू करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, हर महिला को सभी टेस्ट एक ही उम्र में या एक निश्चित अंतराल पर कराने की जरूरत नहीं होती। जांच का चुनाव उम्र, पारिवारिक मेडिकल हिस्ट्री, वजन, जीवनशैली, पहले से मौजूद बीमारियों और डॉक्टर की सलाह के आधार पर किया जाना चाहिए। भारत में भी 30 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए डायबिटीज और कुछ कैंसर की स्क्रीनिंग से जुड़े सरकारी कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

1. ब्लड प्रेशर की नियमित जांच
हाई ब्लड प्रेशर कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी बना रह सकता है। लंबे समय तक रक्तचाप नियंत्रित न रहने पर दिल, दिमाग और किडनी से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए महिलाओं को समय-समय पर अपना ब्लड प्रेशर मापना चाहिए। जिन लोगों का वजन अधिक है, पहले से रक्तचाप बढ़ा हुआ रहा है या परिवार में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच करानी चाहिए। एक बार रीडिंग अधिक आने पर ही हाई ब्लड प्रेशर की पुष्टि नहीं होती; जरूरत पड़ने पर अलग-अलग समय पर माप या घर पर निगरानी की जाती है।

2. ब्लड शुगर और HbA1c टेस्ट
भारत में टाइप-2 डायबिटीज कम उम्र में भी देखने को मिलती है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के दिशानिर्देशों में 30 साल से अधिक उम्र के लोगों की डायबिटीज स्क्रीनिंग की सलाह दी गई है।
इसके लिए फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज, ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) या HbA1c जैसे विकल्प इस्तेमाल किए जा सकते हैं। किस व्यक्ति के लिए कौन-सी जांच उपयुक्त है, यह डॉक्टर तय कर सकते हैं।
जिन महिलाओं का वजन अधिक है, परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, शारीरिक गतिविधि कम है या PCOS की समस्या है, उन्हें अपने डॉक्टर से ब्लड शुगर जांच के बारे में जरूर चर्चा करनी चाहिए। गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज रही हो, तब भी आगे की स्क्रीनिंग पर ध्यान देना जरूरी है।

3. सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग: पैप स्मीयर और HPV टेस्ट
सर्वाइकल कैंसर यानी गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी एक महत्वपूर्ण चिंता है। इसकी शुरुआती अवस्था में कई बार लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए स्क्रीनिंग की भूमिका अहम होती है।
भारत के सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत 30 से 65 साल की महिलाओं के लिए सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग की व्यवस्था है। इसमें मुख्य रूप से VIA यानी एसिटिक एसिड की मदद से गर्भाशय ग्रीवा की जांच की जाती है। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार यह स्क्रीनिंग सामान्य जोखिम वाली महिलाओं के लिए पांच साल में एक बार की जाती है।
पैप स्मीयर और HPV टेस्ट भी सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग के तरीके हैं। HPV के कुछ प्रकार गर्भाशय ग्रीवा में कैंसर से पहले होने वाले बदलावों का कारण बन सकते हैं। कौन-सा टेस्ट कराना चाहिए और कितने अंतराल पर कराना है, यह उपलब्ध जांच सुविधा और महिला की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं।

4. ब्रेस्ट हेल्थ की जांच को न करें नजरअंदाज
महिलाओं को अपने स्तनों में होने वाले असामान्य बदलावों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। स्तन में गांठ, निप्पल से असामान्य डिस्चार्ज, त्वचा में बदलाव, निप्पल का अंदर की ओर खिंचना या आकार में अचानक परिवर्तन जैसे संकेत दिखाई दें तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
भारत के सरकारी स्क्रीनिंग कार्यक्रम में 30 से 65 साल की महिलाओं के लिए क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन यानी स्वास्थ्यकर्मी द्वारा स्तनों की जांच का प्रावधान है। इसके अलावा, मैमोग्राफी की जरूरत उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर तय की जाती है।
ध्यान देने वाली बात है कि 30 साल की उम्र से हर महिला को नियमित मैमोग्राफी कराने की सलाह नहीं दी जाती। जिन महिलाओं के परिवार में कम उम्र में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास है या अन्य जोखिम कारक मौजूद हैं, उन्हें विशेषज्ञ से स्क्रीनिंग की योजना पर चर्चा करनी चाहिए। किसी भी असामान्य बदलाव को अगली नियमित स्क्रीनिंग तक टालना ठीक नहीं है।

5. थायराइड की जांच कब करानी चाहिए?
थायराइड हार्मोन शरीर के मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा, वजन और मासिक धर्म चक्र को प्रभावित करते हैं। थायराइड की गड़बड़ी होने पर थकान, वजन में असामान्य बदलाव, ठंड या गर्मी अधिक लगना, बाल झड़ना और पीरियड्स में अनियमितता जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
ऐसे लक्षण होने पर डॉक्टर TSH टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। जरूरत के अनुसार T3 और T4 की जांच भी कराई जा सकती है। परिवार में थायराइड बीमारी का इतिहास, पहले से थायराइड की समस्या या गर्भावस्था जैसी स्थितियों में जांच की जरूरत अलग हो सकती है।
क्या हर तीन महीने में थायराइड टेस्ट जरूरी है? नहीं। बिना लक्षण वाली हर महिला के लिए हर तीन महीने में थायराइड जांच कराने की कोई सामान्य सिफारिश नहीं है। जांच और दोबारा टेस्ट का अंतराल व्यक्ति की स्थिति तथा डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करता है।
सिर्फ उम्र नहीं, स्वास्थ्य जोखिम भी तय करते हैं जांच की जरूरत
30 साल की उम्र के बाद स्वास्थ्य जांच शुरू करना एक उपयोगी कदम हो सकता है, लेकिन केवल उम्र के आधार पर सभी टेस्ट कराना जरूरी नहीं है। परिवार में किसी बीमारी का इतिहास, वजन, खानपान, शारीरिक गतिविधि, गर्भावस्था से जुड़ी मेडिकल हिस्ट्री और मौजूदा लक्षण भी महत्वपूर्ण हैं।
महिलाओं को समय-समय पर डॉक्टर से अपनी स्वास्थ्य स्थिति पर चर्चा करनी चाहिए। किसी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते जांच कराना बेहतर है। सही स्क्रीनिंग और नियमित स्वास्थ्य देखभाल से कई बीमारियों का पता शुरुआती चरण में लगाने में मदद मिल सकती है।