छठ महापर्व में सूर्य देव को अर्घ्य देने के साथ-साथ प्रसाद की तैयारी का भी विशेष महत्व होता है। इस पूजा में कई तरह के फल और पकवान चढ़ाए जाते हैं, लेकिन गेहूं के आटे और गुड़ से तैयार होने वाला ठेकुआ एक खास पहचान रखता है। बिहार और आसपास के क्षेत्रों में इसे छठ के पारंपरिक प्रसाद के तौर पर बनाया जाता है। समय के साथ यह पकवान केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बिहार की खानपान संस्कृति और वहां के त्योहारों की पहचान भी बन गया है।
ठेकुआ की खास बात यह है कि इसे घर में उपलब्ध साधारण सामग्री से बनाया जा सकता है। इसकी बनावट और स्वाद के साथ-साथ इसे तैयार करने की पारंपरिक विधि भी इसे दूसरे पकवानों से अलग बनाती है। छठ के अवसर पर परिवार के लोग मिलकर इसे तैयार करते हैं और पूजा के बाद प्रसाद के रूप में बांटते हैं।
ठेकुआ बनाने में इस्तेमाल होती हैं पारंपरिक सामग्री
ठेकुआ तैयार करने के लिए मुख्य रूप से गेहूं का आटा, गुड़ और घी इस्तेमाल किया जाता है। स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए कई घरों में सौंफ, इलायची और नारियल भी मिलाया जाता है। बिहार पर्यटन विभाग की जानकारी के मुताबिक, ठेकुआ बिहार का पारंपरिक तला हुआ मीठा पकवान है और इसे छठ पूजा में प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।
इसे बनाने के लिए पहले गुड़ को पानी में घोलकर आटे में मिलाया जाता है। इसके बाद घी और पसंद के अनुसार दूसरे स्वादिष्ट तत्व डालकर सख्त आटा गूंथा जाता है। आटे की छोटी लोइयां बनाकर उन्हें लकड़ी के नक्काशीदार सांचे पर दबाया जाता है। फिर इन्हें तेल या घी में सुनहरा होने तक तला जाता है।

ठेकुआ नाम की उत्पत्ति को लेकर क्या है मान्यता?
ठेकुआ के नाम की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, एक लोकप्रिय लोकमान्यता इसे बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया से जोड़ती है।
दरअसल, ठेकुआ की लोई को लकड़ी के डिजाइनदार सांचे पर रखकर हाथ से दबाया जाता है, जिससे उस पर खास आकृति उभर आती है। माना जाता है कि आटे को ठोकने या दबाने की इसी प्रक्रिया से इसका नाम ठेकुआ पड़ा। इसे कुछ इलाकों में खजुरिया या दूसरे स्थानीय नामों से भी जाना जाता है।

छठ पूजा में ठेकुआ को क्यों माना जाता है खास?
छठ पूजा में शुद्धता और पारंपरिक रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा के लिए तैयार किए जाने वाले प्रसाद में ठेकुआ का प्रमुख स्थान है। बिहार सरकार के प्रकाशन में भी इसे संध्या और उषा अर्घ्य के दौरान चढ़ाए जाने वाले प्रमुख प्रसादों में शामिल बताया गया है।
छठ के तीसरे दिन व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा का समापन करते हैं। इन अवसरों पर बांस के सूप और दउरा में ठेकुआ के साथ केला, नारियल, गन्ना और दूसरे मौसमी फल सजाए जाते हैं। इसके बाद इन्हें सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।
ठेकुआ को प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा भी इस पर्व का अहम हिस्सा है। पूजा के बाद इसे परिवार, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों तक पहुंचाया जाता है।
लंबे समय तक सुरक्षित रहने की वजह से भी उपयोगी
ठेकुआ को अच्छी तरह तलकर तैयार किया जाता है। इसकी अपेक्षाकृत कम नमी वाली बनावट के कारण इसे कई दूसरे ताजे पकवानों की तुलना में कुछ अधिक समय तक रखा जा सकता है। छठ जैसे पर्व में, जहां प्रसाद तैयार करने और बांटने की विशेष व्यवस्था होती है, यह गुण भी इसकी उपयोगिता बढ़ाता है।
हालांकि, इसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, यह बनाने की विधि, नमी और भंडारण की स्थिति पर निर्भर करता है।
बिहार से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंची परंपरा
बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में ठेकुआ लंबे समय से बनाया जाता रहा है। अब रोजगार, पढ़ाई और कारोबार के सिलसिले में देश के अलग-अलग शहरों में रहने वाले परिवार भी छठ पूजा मनाते हैं। ऐसे में उनके साथ ठेकुआ बनाने और प्रसाद बांटने की परंपरा भी दूसरे शहरों तक पहुंची है।
इस तरह ठेकुआ सिर्फ एक मिठाई या पकवान नहीं, बल्कि छठ से जुड़ी पारिवारिक यादों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है।