₹3,200 करोड़ का घोटाला, 29 अफसर, एक IAS विनय चौबे, करोड़ों की मलाई, और दिल्ली की रहस्यमयी चुप्पी
भाग 1: जहां से सड़ांध शुरू हुई – छत्तीसगढ़ की शराब राजनीति
“शराब तो सिर्फ परदा था, असली खेल सत्ता और सिस्टम के गठजोड़ का था।”
छत्तीसगढ़ के 15 जिलों में 2019 से 2023 के बीच नकली होलोग्राम लगी “B-part” शराब सरकारी तंत्र की आंखों के सामने खुलेआम बेची जाती रही। यह शराब रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थी, लेकिन जनता को असली के नाम पर दी जाती रही। यह पूरा तंत्र एक संगठित माफिया नेटवर्क की तरह चला — जिसमें शासन, शराब कारोबारी, अफसरशाही और कुछ नेताओं की साठगांठ रही।
ईओडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक:
- 60.5 लाख शराब के क्रेट बिना सरकारी रजिस्ट्रेशन के बेचे गए।
- इससे नकद ₹2,174.6 करोड़ का अवैध लाभ कमाया गया।
- पूरे घोटाले की अनुमानित राशि ₹3,200 करोड़ तक पहुंच गई।
- हर महीने करीब 400 ट्रकों से नकली होलोग्राम वाली शराब का परिवहन होता रहा।
यह कोई तात्कालिक गड़बड़ी नहीं थी — यह एक दीर्घकालिक और गहराई तक फैली हुई भ्रष्ट व्यवस्था थी, जिसमें अधिकारी और राजनेता मिलकर शराब नीति को निजी धन उगाही का ज़रिया बना चुके थे।
भाग 2: कवासी लखमा का कोडवर्ड – ‘Goods’ और ‘Sweets’
इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में नाम आता है छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा का, जिन्हें इस पूरे घोटाले का राजनीतिक संरक्षक माना जा रहा है।
ईओडब्ल्यू के अनुसार:
- लखमा को हर महीने ₹2 करोड़ नकद ‘घूस’ के तौर पर पहुंचाए जाते थे।
- नकद रकम को ‘goods’ और ‘sweets’ जैसे कोड वर्ड्स से रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता था।
- चार्जशीट में बताया गया है कि उन्होंने इस पूरे नेटवर्क से ₹64 करोड़ की अवैध कमाई की।
- इन पैसों से उन्होंने रायपुर और सुकमा में अचल संपत्तियों का निर्माण किया।
ईओडब्ल्यू ने अपनी 2,300 पन्नों की चार्जशीट में ऐसे 29 अफसरों के नाम उजागर किए हैं जो इस घोटाले में शामिल थे — इनमें से 7 रिटायर्ड हैं और बाकी अब भी पदस्थ हैं।
भाग 3: झारखंड में ‘नीति’ के नाम पर ‘डील’ — IAS विनय चौबे का नेटवर्क
अब बात झारखंड की, जहां IAS विनय कुमार चौबे, जो झारखंड स्टेट बेवरेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (JSBCL) के एमडी रह चुके हैं — उन पर आरोप है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ के इस शराब सिंडिकेट को झारखंड में स्थापित करने में नीतिगत मदद की।
20 मई 2025 को ACB ने उन्हें गिरफ्तार किया। आरोप यह थे कि:
- उन्होंने झारखंड की नई शराब नीति 2022 में जानबूझकर ऐसी व्यवस्था बनाई जिससे छत्तीसगढ़ की एजेंसियों को फायदा मिले।
- इस घोटाले से झारखंड सरकार को करीब ₹38.44 करोड़ का नुकसान हुआ।
- उनके साथ गिरफ्तार किए गए — संयुक्त आयुक्त गजेन्द्र सिंह, JSBCL के दो जीएम (सुधीर कुमार दास और सुधीर कुमार) और एजेंसी प्रतिनिधि नीरज कुमार सिंह।
इसके अलावा, ACB ने एक और मामला दर्ज किया — जिसमें बैंक गारंटी के बगैर एक विदेशी एजेंसी को शराब आपूर्ति का ठेका दिया गया। यह एक अलग घोटाला है, लेकिन इसी सिंडिकेट का हिस्सा माना जा रहा है।
भाग 4: ₹1.26 करोड़ पत्नी के खाते में — ईडी की जांच का खुलासा
ईडी की जांच में यह बात सामने आई कि 2017 से 2023 के बीच विनय चौबे की पत्नी स्वप्ना संचित के बैंक खाते में ₹1.26 करोड़ ट्रांसफर किए गए। यह राशि ‘कंसल्टेंसी फीस’ के नाम पर एक प्राइवेट कंपनी NextGen Infratech Pvt. Ltd. द्वारा ट्रांसफर की गई।
चौंकाने वाली बात यह थी कि:
- न तो इस कंसल्टेंसी का कोई अनुबंध था।
- न ही कोई कार्य विवरण।
- और न ही इन सेवाओं की कोई वित्तीय रिपोर्ट।
- सिर्फ एक मौखिक समझौता बताया गया — जिसमें हर महीने ₹1–1.25 लाख की राशि ट्रांसफर होती रही।
यह राशि उस समय ट्रांसफर हुई जब चौबे राज्य में आबकारी नीति के प्रमुख योजनाकार थे। ईडी का शक है कि यह घूस की रकम थी — जिसे वैध लेनदेन की तरह दिखाया गया।
भाग 5: करोड़पति बने कौन-कौन
छत्तीसगढ़ और झारखंड — दोनों राज्यों में कई सरकारी अफसर, ठेकेदार और शराब कारोबारी इस पूरे घोटाले से रातों-रात ‘रोडपति से करोड़पति’ बन गए।
कवासी लखमा: ₹64 करोड़ की घूस, सुकमा और रायपुर में अचल संपत्ति, नकद लेन-देन।
विनय चौबे और परिवार: बेनामी संपत्तियां, पत्नी के खातों में संदिग्ध ट्रांजैक्शन, संपत्ति जांच में 5 लोकेशन चिन्हित।
JSBCL अधिकारी: सुधीर कुमार, नीरज कुमार सिंह समेत तमाम अधिकारियों ने ठेके देने और लॉजिस्टिक्स कंपनियों से मोटी कमाई की।
एजेंसी प्रतिनिधि: ठेका कंपनियों के एजेंट, जो प्राइवेट लिमिटेड फर्मों के नाम पर करोड़ों का लेनदेन कर रहे थे — आज आलीशान घरों में रह रहे हैं।
भाग 6: दिल्ली खामोश क्यों?
जब दिल्ली शराब नीति घोटाले में CBI और ईडी ने अरविंद केजरीवाल से लेकर मनीष सिसोदिया तक को गिरफ्तार किया, पूछताछ की — तो यह सवाल उठना लाजमी है कि छत्तीसगढ़–झारखंड जैसे मामलों में ऐसी सख्ती क्यों नहीं?
संभावित वजहें:
- छत्तीसगढ़–झारखंड मामले में अब तक कोई ‘केंद्रीय राजनैतिक लिंक’ सामने नहीं आया है।
- स्थानीय स्तर पर जांच एसीबी और ईओडब्ल्यू कर रहे हैं — केंद्र की एजेंसियां सेकेंडरी मोड में हैं।
- राजनीतिक प्राथमिकताएं — केंद्र का ध्यान अभी दिल्ली, पंजाब और अन्य राज्यों की तरफ है।
- कुछ सूत्र यह भी मानते हैं कि दिल्ली के मुक़ाबले छत्तीसगढ़–झारखंड में ‘राजनैतिक संतुलन’ बनाए रखने के लिए कुछ हद तक ‘संयमित कार्रवाई’ हो रही है
जिम्मेदार कौन?
| नाम | पद | आरोप |
| कवासी लखमा | पूर्व आबकारी मंत्री, छत्तीसगढ़ | ₹64 करोड़ की अवैध कमाई, नकद में ‘गुड्स’ भेजवाना |
| विनय चौबे | IAS, झारखंड | नीति बदलने में भूमिका, बेनामी संपत्ति, पत्नी के खाते में ₹1.26 करोड़ |
| गजेन्द्र सिंह | संयुक्त आयुक्त, JSBCL | ठेकेदारी घोटाले में सहभागी |
| सुधीर कुमार, नीरज सिंह | JSBCL अधिकारी/एजेंसी प्रतिनिधि | बैंक गारंटी घोटाला, ₹38.44 करोड़ नुकसान |
| अन्य 29 अधिकारी | एक्साइज विभाग, छत्तीसगढ़ | नकली होलोग्राम शराब, 60 लाख क्रेट ब्लैक मार्केट में भेजना |
क्या बोलती पब्लिक ?
और सबसे बड़ा सवाल — क्या इस बार भी कुछ चेहरे कुर्बान कर, कुछ और बड़े चेहरे बचा लिए जाएंगे?
यह सिर्फ शराब का मामला नहीं है — यह सिस्टम के सुनियोजित भ्रष्टाचार की गाथा है।
छत्तीसगढ़ में जहां नकली होलोग्राम से ₹3,200 करोड़ का घोटाला हुआ, वहीं झारखंड में नीति बदलकर सरकारी राजस्व को ₹38 करोड़ का नुकसान पहुंचाया गया।
इसमें अधिकारी, मंत्री, ठेकेदार, एजेंट और व्यवसायी — सबने मिलकर जनता की आंखों में धूल झोंकी।
अब जब गिरफ्तारी हो रही है, तो सवाल ये नहीं है कि ‘किसे पकड़ा गया’, सवाल ये है कि ‘कौन अब तक बचा हुआ है?’
RTI दस्तावेज़, कोर्ट केस और दिल्ली की खामोशी — शराब घोटाले की गहराई में क्या छुपा है?
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RTI खुलासे: सिस्टम के पर्दे के पीछे
1. रहस्यमयी गाड़ियों का खेल – रायपुर पुलिस और एक्साइज विभाग पर बड़ा सवाल
एक आरटीआई के ज़रिए सामने आया कि रायपुर पुलिस विभाग हर महीने 600 से 650 गाड़ियाँ किराए पर चला रहा है। लेकिन इन गाड़ियों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
RTI दस्तावेज़ बताते हैं कि इन गाड़ियों में से कई अफसरों, रिश्तेदारों या कथित एजेंसी प्रतिनिधियों के नाम पर हैं। इन्हें पुलिस के नाम पर मोटी रकम देकर किराए पर लिया जाता है – यह पैसा सरकारी खजाने से जाता है, लेकिन असली लाभ निजी जेबों में जाता है।
यह घोटाले की प्रकृति को दर्शाता है – कैसे नकली पेपरवर्क और ठेके के नाम पर सरकारी सिस्टम को ठगा जाता है।
स्रोत: The Hitavada (29 जून 2025)
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2. 200+ पन्नों की गुप्त रिपोर्ट – CBI जांच की मांग
छत्तीसगढ़ बीजेपी के कानूनी सलाहकार और पूर्व लोक अभियोजक ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक 200 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी, जिसमें स्पष्ट आरोप लगाए गए कि राज्य सरकार के संरक्षण में शराब के ठेकेदारों को फर्जी रजिस्ट्रेशन से फायदा पहुंचाया गया।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि राज्य का एक्साइज विभाग एक ‘organized cartel’ की तरह काम कर रहा था, जहां मंत्री से लेकर क्लर्क तक लाभ में थे। इस रिपोर्ट में CBI जांच की मांग की गई है।
स्रोत: organiser.org (11 अप्रैल 2025)
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कोर्ट केस और कानूनी कार्यवाही – किसने क्या किया?
1. CBI को मिला मामला – झारखंड का 450 करोड़ का कनेक्शन
छत्तीसगढ़ घोटाले के समानांतर, झारखंड में भी एक समान मॉडल अपनाया गया – जिसमें शराब की बोतलों के रजिस्ट्रेशन, स्टॉक और सप्लाई चेन में गड़बड़ियों के जरिए करीब 450 करोड़ रुपये की हानि राज्य को हुई।
यह मामला अब CBI को सौंपा जा चुका है और इसे छत्तीसगढ़ सिंडिकेट से जोड़ कर देखा जा रहा है।
स्रोत: Organiser.org (अप्रैल 2025)
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2. ED की कार्यवाही – छापेमारी और जब्ती
अक्टूबर 2024 में ईडी ने IAS विनय चौबे, गजेन्द्र सिंह, सुधीर कुमार, और एजेंसी प्रतिनिधियों के ठिकानों पर एक साथ छापा मारा।
इन छापों में कई लैपटॉप, नकद, और जमीन की डील से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए।
इसके अलावा, कवासी लखमा से जुड़े तीन संपत्तियों को भी जब्त किया गया – रायपुर की एक रिहायशी प्रॉपर्टी, सुकमा में उनका पारिवारिक निवास, और कांग्रेस भवन के पास स्थित एक बहु-मंजिला भवन।
स्रोत: India Today, Economic Times (अक्टूबर 2024 – जून 2025)
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3. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देश
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया – जिसमें यह कहा गया कि मनी लॉन्ड्रिंग केस में जमानत के लिए एक साल जेल में रहना अनिवार्य नहीं है।
इस फैसले का प्रभाव विनय चौबे जैसे आरोपियों पर पड़ सकता है, जो 8 महीने से अधिक समय से हिरासत में हैं।
इसके अलावा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अन्य केस में गिरफ्तारी को गैर-कानूनी घोषित किया, क्योंकि गिरफ्तारी से पहले उचित नोटिस नहीं दिया गया था। इससे संकेत मिलता है कि कई मामलों में प्रक्रियागत खामियां भी हैं – जो आरोपियों को राहत देने का आधार बन सकती हैं।
स्रोत: Times of India, Deccan Herald
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दिल्ली की रहस्यमयी चुप्पी – क्यों नहीं टूटी अब तक?
जब दिल्ली सरकार की शराब नीति में नाम आने पर मनीष सिसोदिया और अन्य AAP नेताओं पर ईडी और सीबीआई ने कड़ी कार्रवाई की – छापेमारी, पूछताछ और गिरफ्तारियां – तब यह सवाल खड़ा होता है कि छत्तीसगढ़ और झारखंड में अब तक वैसी सख्ती क्यों नहीं हुई?
संभावित कारण:
1. राजनीतिक प्राथमिकता:
दिल्ली की सरकार के खिलाफ कार्रवाई केंद्र के लिए राजनीतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण थी। छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में फिलहाल राजनीतिक संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।
2. प्रत्यक्ष लिंक नहीं:
अब तक की जांच में इन घोटालों का कोई स्पष्ट संबंध केंद्रीय नेताओं या दिल्ली आधारित नेटवर्क से नहीं मिला है। इसीलिए ईडी और सीबीआई का फोकस दिल्ली केस की तरह आक्रामक नहीं है।
3. डेटा और ट्रैकिंग की कमी:
झारखंड और छत्तीसगढ़ में फाइनेंशियल ट्रैकिंग के डिजिटल रिकॉर्ड काफी कम हैं। अधिकतर लेन-देन नकद या फर्जी कंपनियों के नाम पर हुआ, जिससे ईडी के लिए इनवेस्टिगेशन टेक्निकली जटिल हो जाती है।
4. एजेंसियों पर दबाव:
कई रिपोर्टों में कहा गया कि राज्य स्तर पर जांच को धीमा करने या सीमित रखने के लिए राजनीतिक स्तर पर दबाव भी डाला जा रहा है।
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निष्कर्ष – जांच रुकी नहीं है, लेकिन धीमी और सीमित है
• RTI ने यह साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ और झारखंड में सिस्टम का हर हिस्सा भ्रष्टाचार में शामिल रहा है – गाड़ियाँ हों या रजिस्ट्रेशन पेपर।
• CBI और ED ने छापेमारी, जब्ती, और केस दर्ज ज़रूर किए हैं, लेकिन अभी तक इस घोटाले की ‘राजनीतिक धुरी’ तक सीधी पहुंच नहीं हुई है।
• दिल्ली की चुप्पी इस बात की ओर संकेत करती है कि जब तक किसी राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक हस्ती का नाम नहीं आता, तब तक इस केस को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
• सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ आने वाले समय में आरोपियों को राहत भी दे सकती हैं – यदि प्रक्रिया में त्रुटियाँ साबित हुईं।
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अब अगला हिस्सा तैयार किया जा सकता है:
• RTI मेल ट्रेल का डॉक्यूमेंटेशन
• Arrested आरोपियों की जमानत और ट्रायल स्थिति
• दिल्ली की सियासी चुप्पी को तोड़ने वाले संभावित घटनाक्रम
• “आगे कौन फंसेगा?”
Disclaimer:
यह रिपोर्ट सार्वजनिक दस्तावेज़ों, मीडिया रिपोर्ट्स, जांच एजेंसियों के प्रेस रिलीज़ और RTI उत्तरों के आधार पर तैयार की गई है। The Mediawala Express किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की छवि खराब करने का उद्देश्य नहीं रखता। यदि किसी पक्ष को इस रिपोर्ट से आपत्ति हो, तो वे प्रमाण सहित अपना पक्ष रखने के लिए संपर्क कर सकते हैं।
