झारखंड में आतंकी संगठन हिज्ब उत तहरीर (HUT) की एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश हुआ है। जांच एजेंसियों ने समय रहते कार्रवाई कर संगठन की उस योजना को विफल कर दिया, जिसमें राज्य में आरएसएस से जुड़े एक प्रमुख हिंदूवादी नेता की हत्या की साजिश रची गई थी। इस साजिश के पीछे संगठन की मंशा राज्य में सांप्रदायिक तनाव फैलाकर अपनी जड़ें मजबूत करने की थी।

अम्मार याशर: साजिश का मास्टरमाइंड

इस पूरी साजिश का मास्टरमाइंड अम्मार याशर निकला, जो पहले इंडियन मुजाहिदीन का सक्रिय सदस्य रह चुका है। वह लगभग 10 वर्षों तक जेल में बंद था और हाल ही में जमानत पर रिहा हुआ था। रिहाई के बाद उसने इंडियन मुजाहिदीन से नाता तोड़ते हुए हिज्ब उत तहरीर का दामन थामा और सक्रिय रूप से युवाओं की भर्ती में जुट गया।

धनबाद के युवक-युवती को बनाया मोहरा

जांच में सामने आया है कि याशर ने धनबाद के दो युवाओं—एक युवक और एक युवती—को संगठन से जोड़ा और उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित किया। यही नहीं, इनसे हथियार खरीदवाने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। मुंगेर से हथियार खरीदने की योजना थी और इसके लिए डार्क वेब व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग किया जा रहा था।

मोबाइल चैट्स और डिजिटल सबूतों से खुलासा

गिरफ्तार किए गए संदिग्धों के मोबाइल की जांच में कई अहम सुराग मिले हैं। व्हाट्सएप चैट्स, डार्क वेब गतिविधियों और पैसों के लेनदेन से संबंधित डिजिटल सबूतों से पुष्टि हुई है कि संगठन ने हथियार खरीदने की योजना बनाई थी। हथियारों की तस्वीरें साझा की गई थीं और हत्या को अंजाम देने के लिए स्थान व समय पर भी चर्चा हुई थी।

गिरफ्तारियां और जांच

झारखंड एटीएस और केंद्रीय एजेंसियों के संयुक्त अभियान में धनबाद से गुलफाम हसन, अयान जावेद, मो. शहजाद और अयान की पत्नी शबनम परवीन को गिरफ्तार किया गया। इन सभी से पूछताछ में हिज्ब उत तहरीर की गहरी साजिशों की परतें खुलीं। वहीं, याशर को पहले राजस्थान में हिरासत में लिया गया था, जहां वह जेल से छूटने के बाद रह रहा था।

2014 से लेकर 2024 तक याशर का सफर

अम्मार याशर की आतंकवाद में भूमिका कोई नई नहीं है। 2014 में पटना गांधी मैदान ब्लास्ट के बाद जब देशभर में इंडियन मुजाहिदीन के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई, तब पहली बार उसका नाम सामने आया। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उसे शाहीनबाग से हिरासत में लिया था, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते वह छूट गया। बाद में राजस्थान एटीएस ने उसे गिरफ्तार किया और जयपुर, लालकोटी व जोधपुर में दर्ज मामलों में वह 10 साल जेल में रहा।

निष्कर्ष

राज्य की सुरक्षा एजेंसियों ने समय रहते बड़ी आतंकी साजिश को नाकाम कर दिया है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे जेल से छूटे कट्टरपंथी दोबारा सक्रिय होकर समाज में हिंसा फैलाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में इन गतिविधियों पर निगरानी और कठोर कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।

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