दिल्ली/रांची:

झारखंड की राजनीति और श्रमिक आंदोलन के एक मजबूत स्तंभ चंद्रशेखर उर्फ ददई दुबे का बुधवार, 10 जुलाई 2025 को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और 79 वर्ष के थे।

जननायक थे ददई दुबे

गढ़वा जिले से ताल्लुक रखने वाले ददई दुबे का राजनीतिक सफर एक मुखिया के रूप में शुरू हुआ, लेकिन उन्होंने जल्दी ही खुद को एक ज़मीनी नेता के रूप में स्थापित कर लिया। वे तीन बार विधायक और एक बार सांसद रहे। 2013 में हेमंत सोरेन सरकार में वे ग्रामीण विकास, श्रम और रोजगार मंत्री बने और गांव-कस्बों की योजनाओं को गति दी।

श्रमिकों की ताकत थे

कोयलांचल क्षेत्र में मजदूरों के अधिकारों के लिए ददई दुबे की लड़ाई हमेशा याद की जाएगी। वे राष्ट्रीय कोयला मजदूर संघ (INTUC) के वरिष्ठ पदों पर रहे और उन्होंने श्रमिकों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। झारखंड में ट्रेड यूनियन आंदोलन को मजबूत करने में उनका योगदान बेमिसाल था।

राजनीतिक सफर और स्पष्टवादिता

ददई दुबे का राजनीतिक जीवन स्पष्टवादिता और निर्भीकता से भरा रहा। वे कई बार कांग्रेस से नाराज होकर अलग हुए, 2014 में टीएमसी से भी जुड़े, लेकिन उनकी वैचारिक निष्ठा हमेशा आमजन और श्रमिकों के पक्ष में रही।

2015 में गढ़वा में एक विवाद में गिरफ्तारी हुई, परंतु उनके जुझारूपन में कोई कमी नहीं आई।

श्रद्धांजलियां और सम्मान

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर, डॉ. अजय कुमार समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

मुख्यमंत्री ने कहा — “झारखंड ने एक जनसंवेदनशील और जुझारू नेता खो दिया है।”

निष्कर्ष:

ददई दुबे अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी विचारधारा, संघर्ष और नेतृत्व झारखंड की राजनीति और श्रमिक चेतना में सदा जीवित रहेगी। वे उस पीढ़ी के नेता थे जो सत्ता में रहकर भी संघर्ष की ज़मीन नहीं छोड़ते थे।

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