चिता की ज्वाला, मृत्यु का सन्नाटा और बीच में योग का अप्रतिम संतुलन

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर उस रात केवल चिताएं नहीं जल रही थीं, वहां भारतीय योग की साधना भी जल रही थी – योगाचार्य रवि व्योम शंकर झा के तप, संयम और संकल्प की साधना। बिहार के मधुबनी जिले के ढंगा गांव से आने वाले इस युवा योगी ने 4 घंटे 44 मिनट तक शीर्षासन मुद्रा में रहकर एक ऐसा विश्व रिकॉर्ड रच दिया, जिसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2025 के आयोजन में देर तक सुनाई देती रही।

यह आयोजन 17 जून की रात 11:16 बजे प्रारंभ हुआ और 18 जून की सुबह 4:00 बजे तक चला। इस दौरान मणिकर्णिका घाट पर चिता जलती रही, शवों की आवाजाही होती रही, और बीच में रवि झा अपनी सांसों को साधे, सिर के बल खड़े, एकाग्र और अडिग रहे।

क्यों खास है मणिकर्णिका घाट पर शीर्षासन?

मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान नहीं है, यह हिंदू संस्कृति में मोक्ष का द्वार माना जाता है। यहां मृत्यु के बाद की यात्रा आरंभ होती है, वहीं योगाचार्य रवि झा ने मृत्यु के बीच जीवन का ध्यान किया।

यह स्थान, जहां मृत्यु की निस्वार्थता हर क्षण जलती है, वहां 4 घंटे 44 मिनट तक शीर्षासन केवल एक योग अभ्यास नहीं, बल्कि मौन तपस्या, आध्यात्मिक शक्ति और संस्कारिक साहस की पराकाष्ठा है।

कौन हैं योगाचार्य रवि व्योम शंकर झा?

  • गांव: ढंगा, जिला मधुबनी, बिहार
  • पहचान: अंतरराष्ट्रीय योग साधक, कई विश्व रिकॉर्डधारी
  • विशेष उपलब्धियां:
    • दुबई में 24 घंटे जल योग – Guinness World Records
    • प्रयागराज में 1008 पवित्र डुबकी – 1 घंटे 51 मिनट में
    • पद्म शीर्षासन – 39 मिनट 30 सेकंड तक (Golden Book of world Records

रवि झा योग को केवल शरीर के व्यायाम तक सीमित नहीं मानते। उनके लिए योग भारतीय आत्मा की जागृति, संस्कार की शिक्षा और संयम की साधना है।

समाज और संस्कृति को मिला नया संदेश

इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड के बाद मधुबनी और मिथिला क्षेत्र में उत्सव का माहौल रहा। लोगों ने इसे बिहार और देश के लिए गौरव का क्षण बताया।

स्थानीय लोगों ने ‘द मीडिया वाला एक्सप्रेस’ से बातचीत में कहा कि,

“रवि झा जैसे युवाओं के कारण हमारी संस्कृति को दुनिया में सम्मान मिल रहा है। यह रिकॉर्ड सिर्फ योग का नहीं, हमारी सनातन परंपरा का वैभव है।”

यह प्रयास बताता है कि योग केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन की चीज़ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तराधिकार और जीवन दर्शन है। मणिकर्णिका की आग के बीच साधना करके उन्होंने यह प्रमाणित किया कि भारतीय योग का आधार केवल पसीना नहीं, बल्कि तप, त्याग और तटस्थता है।

भावी योजनाएं

रवि झा ने संकेत दिया है कि वे आगे भी ऐसे ही प्रयोगात्मक योग साधना करते रहेंगे जो न केवल रिकॉर्ड बनाए, बल्कि समाज को संदेश दे। उनका लक्ष्य है –

“योग को आत्मा के स्तर पर महसूस कराना और विश्व को भारत की आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ना।”

निष्कर्ष: योग को बनाया साधना और संस्कृति का सेतु

मणिकर्णिका घाट पर यह रिकॉर्ड इस बात का प्रमाण है कि जब योग साधना बन जाए, तब मृत्यु के बीच भी जीवन का संदेश सुनाई देता है। रवि झा का यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि योग महज़ आसन नहीं, भारतीय आत्मा की चुप साधना है।

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